मोबाइल और परिवार

संध्या का समय था। रसोई से बर्तन खटकने की आवाज़ें आ रही थीं। घर के ड्राइंग रूम में चार लोग बैठे थे—पिता, माँ, बेटा और बेटी। बाहर से देखने वाला कोई अजनबी कह देता, “वाह! कितना सुखी परिवार है, सब साथ में बैठे हैं।” लेकिन सच्चाई ये थी कि चारों के बीच कोई बातचीत नहीं हो रही थी। सबके हाथों में मोबाइल थे, और चेहरे की रौशनी स्क्रीन से झलक रही थी। पिता जी ऑफिस से लौटकर मोबाइल पर न्यूज़ पोर्टल खंगाल रहे थे। माँ फेसबुक पर पड़ोसन की फोटो देखकर मन ही मन खीझ रही थीं—“इतनी उम्र में भी कितनी सजी-धजी रहती है।” बेटा इंस्टाग्राम पर रील्स बना रहा था और बेटी व्हाट्सएप चैट में अपनी सहेलियों के साथ मस्त थी। टेबल पर रखी चाय ठंडी हो चुकी थी। लेकिन किसी को उसकी सुध नहीं थी। घर में चुप्पी थी, पर मोबाइल की “टिंग-टिंग” और “डिंग-डांग” आवाजें माहौल को भर रही थीं। यह वही परिवार था जहाँ कभी शाम होते ही सब लोग बरामदे में बैठते थे। पिता जी दिनभर के किस्से सुनाते, माँ अपनी सहेलियों या पड़ोस की बातें करतीं, और बच्चे खिलखिलाकर हँसते थे। रसोई से आती ताज़ा बने खाने की खुशबू सबको खींच लाती। साथ बैठकर रोटियाँ सेंकने और सब्ज़ी परोसने का आनंद ही अलग होता था। लेकिन अब… रोटियाँ प्लेट में चुपचाप आ जाती थीं और सब चुपचाप खाते हुए मोबाइल पर नज़रें गड़ाए रहते। कभी किसी को यह ध्यान ही नहीं रहता कि सामने बैठा व्यक्ति कुछ कहना चाहता है। --- घटना जिसने सबको झकझोर दिया एक दिन अचानक मोहल्ले में पास वाले शर्मा जी का देहांत हो गया। हार्ट अटैक पड़ा था। पूरा मोहल्ला इकट्ठा हो गया, लेकिन हमारे परिवार के चारों लोग उस समय भी अपने-अपने मोबाइल में व्यस्त थे। जब पड़ोसियों ने खबर दी तो वे सब चौंके, लेकिन उनके भीतर की संवेदना जैसे कहीं खो चुकी थी। उस रात माँ की आँखों में नींद नहीं आई। उन्होंने पिता जी से कहा— “क्या आपको नहीं लगता कि हम अपने बच्चों से दूर होते जा रहे हैं? अब हम चारों साथ तो हैं, पर मन से अलग-अलग दुनियाओं में बंटे हुए।” पिता जी चुप रहे। उन्हें भी भीतर से यह कसक महसूस हो रही थी। --- बच्चों की शिकायत अगले ही दिन, स्कूल से लौटते वक्त बेटी ने अपनी सहेली से कहा— “हमारे घर में किसी के पास समय ही नहीं है। सब अपने-अपने फोन में रहते हैं। कभी लगता है, काश हम भी गाँव में रहते, जहाँ सब लोग साथ बैठकर बातें करते।” बेटे ने भी एक बार अपने दोस्त से झुंझलाकर कहा था— “पापा को तो बस फोन और ऑफिस की खबरें चाहिए। मम्मी फेसबुक और सीरियल की दुनिया में खोई रहती हैं। हमसे कोई बात ही नहीं करता।” बच्चों का यह दर्द धीरे-धीरे माँ-बाप के कानों तक भी पहुँचा। एक रविवार को पिता जी ने सबको बुलाया और कहा— “देखो बच्चों! हम सब एक घर में रहते हुए भी दूर होते जा रहे हैं। अब वक्त है कि हम खुद को बदलें। आज से रात के खाने के समय कोई भी मोबाइल इस्तेमाल नहीं करेगा। हम सिर्फ बातें करेंगे।” शुरुआत में सबको अजीब लगा। बेटे को लगा कि वह दोस्तों से चैट मिस कर देगा, बेटी को सहेलियों के व्हाट्सएप ग्रुप की चिंता थी, माँ को सीरियल का टाइम और पिता जी को ताज़ा खबरें छोड़नी पड़ीं। लेकिन जैसे-जैसे दिन गुजरे, यह नया नियम सबको अच्छा लगने लगा। खाने की मेज़ पर हँसी-मज़ाक फिर से लौट आया। बच्चे स्कूल की कहानियाँ सुनाते, माँ अपनी दिनभर की व्यस्तताएँ साझा करतीं, पिता जी भी अपने ऑफिस के अनुभव बताते। धीरे-धीरे यह परिवार समझ गया कि मोबाइल बुरा नहीं है। बुरा है उसका अत्यधिक इस्तेमाल और अपने अपनों की उपेक्षा करना। अब पिता जी मोबाइल से नई-नई खबरें तो पढ़ते, लेकिन साथ ही बच्चों के लिए ज़रूरी शैक्षिक ऐप भी ढूँढते। माँ फेसबुक पर कम समय देतीं, लेकिन यूट्यूब से नई रेसिपी सीखकर सबको खिलातीं। बेटा और बेटी ने तय किया कि दिन में सिर्फ एक-दो घंटे ही सोशल मीडिया पर रहेंगे, बाकी समय पढ़ाई और परिवार को देंगे। परिवार की आपसी नज़दीकियाँ लौट आईं। बेटी ने अपनी डायरी में लिखा— “अब हमारा घर सचमुच घर जैसा लगता है। स्क्रीन की रौशनी से बेहतर माँ-पापा की मुस्कान की रौशनी है।” बेटे ने भी एक दिन स्वीकार किया— “पहले लगता था कि बिना फोन मैं रह ही नहीं सकता। लेकिन अब समझ में आया कि असली खुशी तो पापा की हँसी और माँ की कहानियों में है।” माँ-बाप ने महसूस किया कि बच्चों से संवाद करना ही सबसे बड़ी पूँजी है। सीख मोबाइल ने हमारी ज़िंदगी आसान बनाई है, लेकिन वही मोबाइल अगर रिश्तों के बीच दीवार बन जाए तो घर घर नहीं, “गेस्ट हाउस” बन जाता है—जहाँ लोग रहते तो साथ हैं, पर एक-दूसरे के लिए अजनबी हो जाते हैं। सच्चाई यह है कि मोबाइल हमारा नौकर है, मालिक नहीं। अगर हम उसे सही सीमा में रखकर इस्तेमाल करें तो परिवार की गर्माहट और रिश्तों की मिठास कभी नहीं खोएगी।

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: निर्मेश
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