दबी हुई सिसकियां

आज फिर से वो चीख सुनाई दे रही थी , जो बरसों से दबा दी गई थी ... , आज फिर से वो सिसकियां ले रही थी , जिसे बंद दरवाजे के पीछे कोई सुन न सके ,

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कविता

लेखक : Mahima
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