यह कहानी एक पिता, रामू, के संघर्ष की है, जिसका सैनिक बेटा शहीद हो जाता है। जब वह अपने बेटे के लिए एक सम्मानजनक कफ़न का इंतज़ाम नहीं कर पाता, तो वह शहर की ओर निकलता है। वहाँ उसे एक अमीर आदमी, रतनलाल, द्वारा अपमानित होना पड़ता है। निराश होकर वापस लौटने पर, पूरा गाँव मिलकर प्यार और एकजुटता से एक कफ़न तैयार करता है। अंत में, रतनलाल को अपनी गलती का अहसास होता है और वह भी माफ़ी माँगने आता है, लेकिन रामू गाँववालों द्वारा बनाए गए कफ़न को ही चुनता है, जो सच्चे प्यार और सम्मान का प्रतीक होता है। यह कहानी दिखाती है कि पैसों से ज़्यादा मूल्यवान इंसानियत और लोगों का साथ होता है।
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