पलायन और रिश्तों की डोर

गाँव की मजबूरी से शहर की मशीनों तक और फिर रिश्तों की तलाश में घर वापसी तक। यह कहानी एक परिवार के बिछड़ने और फिर से जुड़ने की है। यह सवाल छोड़ जाती है कि क्या सचमुच पैसा, अपनेपन की कमी पूरी कर सकता है?

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: विजय सांगा
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