यह कहानी एक साधारण-से लेकिन अनमोल वस्तु – पुराने रेडियो – के इर्द-गिर्द घूमती है। कहानी में रेडियो सिर्फ एक यंत्र नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों को जोड़ने वाला धरोहर बनकर सामने आता है। यह दादाजी के ज़माने की यादों, परिवार के हँसी-खुशी भरे पलों और रिश्तों की गर्माहट का प्रतीक है। समय के साथ जब टीवी और मोबाइल ने जगह ले ली, तो यह रेडियो अटारी में धूल खाता रह गया। लेकिन जब पोता राघव इसे फिर से खोजकर ठीक करवाता है, तो वह घर की पुरानी रौनक और साथ बैठने की परंपरा वापस ले आता है। “पुराना रेडियो” सिर्फ एक परिवार की दास्तान नहीं, बल्कि उस दौर की झलक है जब आवाज़ें इंसानों को जोड़ती थीं।
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