राजदरबार एक ऐतिहासिक घटना पर आधारित है। कैसे अंग्रेज आम हिंदुस्तानी पर जुर्म करते थे। *पार्ट 1* _1980_ ये बात उस समय की है जब देश में रियासतें हुआ करती थी। उस समय अंग्रेज भारत छोड़ कर चले गए थे। परन्तु कुछ उनके सूबेदार अभी भी राज कर रहे थे। मै ये जो आलोचना लिखने जा रहा हूं इसी पर ये आधारित है। ये मैंने नहीं देखा है। परन्तु अपने बड़े बुजुर्गों से सुना है। वो भी एक समय था जब एक आम आदमी राजपूतों के सामने नहीं खड़ा हो सकता था। यहां तक चपल भी नहीं पहन सकते थे। चारों तरफ उनके भय की घनघोर घटा रहती थी। जब वो घर से चल देते थे तो रास्ते भी खाली हो जाते थे।लोग कहते थे छुप जाओ राजा साहेब आ रहे हैं। अगर कोई सामने दिख भी जाय तो उसे सजा मिलती थी। सभी लोग दंडवत प्रणाम करते थे। चाहे कोई भी हो सलाम करना पड़ता था। चाहे प्रेम हो या डर। उनके घर में नौकरों की लाइन लगी रहती थी। जब वो खेत में घूमने के लिए जाते थे तो उनके साथ 20 या 30 नौकर जाते थे सेवा के लिए। खेत में काम करने वाले लोग बहुत थे। उनका शासन उच्च स्तर पर था। किसी को सर उठकर बात करने ही इजाजत नहीं थी। ये लोग ही लोगों के मैटर या मामले की पंचायत करते थे। और ये जो कहते थे वही सही कहते थे। और लोगों को मानना पड़ता था।इनका पूरा भय लोगों में व्याप्त था। यही नहीं जो राजदरबार में काम करता उसका भी रुतबा कम नहीं था। उससे भी लोग सम्मान से बात करते थे और डरते भी थे। अधिकतर लोग बिना पढ़े लिखे थे। Other cast ke logo ko नीच दृष्टि से देखा जाता था। जाति भेदभाव की भावना उच्च स्तर पर थी। जूता पहनने का अधिकार सिर्फ़ राजपूतों को ही था। यहां तक की लोग उनके सामने नहीं बैठ सकते थे। हमेशा जमीन पर बैठे रहते थे। जिसको चाहे उसे मार देना गली देना उनका बड़प्पन हो गया था।
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