रिश्तों की चुभन

रिश्तों की मीठी डोर जब टूटने लगती है, तो अपनापन भी चुभन बन जाता है, ये कविता उसी दर्द को बयां करती है, जहाँ खामोशी ही सबसे बड़ी आवाज़ बन जाती है।

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: विजय सांगा
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