कुदरत का कहर

जब प्रकृति अपने ग़ुस्से में आती है, तो इंसान की तमाम ताक़तें बौनी साबित हो जाती हैं। लेकिन क्या इंसान सचमुच कुदरत के कहर को झेलकर फिर से खड़ा हो पाएगा, या ये सिर्फ़ उसकी अगली चेतावनी है?”

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दैनिक प्रतियोगिता

लेखक : विजय सांगा
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