कुदरत का न्याय (स्वैच्छिक)

पहाड़ पिघल रहे, नदियां उफान मार रही हैं, धरती की गोद से चीख़ें बाहर आ रही हैं। इंसान की करतूतों ने बिगाड़ा है संतुलन, जो कुदरत का कहर अब विनाश बनकर बरस रहा है......

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दैनिक प्रतियोगिता

लेखक : Sukoon Bazzad ✍️
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