अहंकारी राजकुमार वीरेंद्र ने किन्नरों के आशीर्वाद को तुच्छ समझकर उनका अपमान किया। आहत किन्नरों का श्राप नगर पर भारी पड़ा। समृद्धि बर्बाद होने लगी, बीमारियाँ और अकाल छा गया। अंततः राजकुमार को समझ आया कि सम्मान और विनम्रता ही सच्ची शक्ति हैं। क्योंकि किन्नर का श्राप कभी व्यर्थ नहीं जाता।
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