यह कहानी लेखक विवेक राठौड़ की है, जो साहित्यिक मंच के अहंकारी दरबार से टकराता है। उसे दरकिनार किया जाता है, पर उसकी कलम हार नहीं मानती। सच्चे शब्दों और पाठकों के विश्वास से वह साबित करता है कि स्याही ही असली ताक़त है, तख़्त नहीं।
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