स्वैच्छिक सेवा – त्याग की मिसाल गाँव के चौपाल पर लोग अक्सर बैठकर बातें किया करते थे। सबको अपनी-अपनी परेशानियाँ थीं — कोई रोज़गार की चिंता में था, कोई बच्चों की पढ़ाई की कमी से दुखी। लेकिन किसी के पास इतना समय नहीं था कि वे दूसरों की समस्या को अपनी मानें। इसी बीच गाँव में सविता दीदी आईं। वे शहर में नौकरी करती थीं, लेकिन छुट्टियों में गाँव लौटकर हमेशा सोचतीं — “गाँव तो वहीँ का वहीँ है, यहाँ कोई बदलाव क्यों नहीं होता?” एक दिन उन्होंने निश्चय किया कि अब सिर्फ़ सोचने से काम नहीं चलेगा, बल्कि कुछ स्वैच्छिक सेवा करनी होगी। उन्होंने अपनी तनख्वाह से दो बांस की चौखट और तिरपाल मंगवाया और गाँव के बच्चों को इकट्ठा कर पढ़ाना शुरू किया। गाँव वाले पहले हँसते — “क्या मिलेगा तुझे यह सब करके? तेरा ही समय बर्बाद होगा।” लेकिन धीरे-धीरे बच्चे पढ़ने लगे, और उनकी आँखों में सपने जगने लगे। कुछ महीनों में ही फर्क दिखने लगा। अब बच्चे अक्षर पहचानने लगे, गिनती लिखने लगे। सविता दीदी ने त्याग का रास्ता चुना — वे छुट्टियों में घूमने या आराम करने की जगह गाँव के बच्चों के लिए मेहनत करतीं। अपने सुख-सुविधा को पीछे छोड़कर उन्होंने शिक्षा को प्राथमिकता दी। उनके इस प्रयास को देखकर धीरे-धीरे गाँववाले भी जुड़ने लगे। किसी ने बेंच बनाकर दी, किसी ने कापियाँ बाँट दीं। महिलाएँ बच्चों के लिए टिफ़िन लाने लगीं। एक छोटी सी पहल ने पूरे गाँव को बदल डाला। आज वह स्कूल सिर्फ़ पढ़ाई की जगह नहीं, बल्कि त्याग और स्वैच्छिक सेवा का प्रतीक बन चुका है। गाँव के लोग जब भी बच्चों को पढ़ते देखते हैं, तो गर्व से कहते हैं — “यह सब संभव हुआ है सविता दीदी के त्याग और सेवा से।” और सविता दीदी? वे बस मुस्कुरा देती हैं और कहती हैं — “स्वैच्छिक सेवा में जो संतोष है, वह किसी बड़ी नौकरी या ऊँचे पद से भी नहीं मिल सकता।”
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