मैं आजाद हूं

मैं आज़ाद हूँ… जैसे हवा खुले आसमान में उड़ती है, जैसे नदी अपनी राह खुद बनाती है। मैं आज़ाद हूँ… न किसी के बंधन में, न किसी डर के साए में, अपने सपनों के रंग भरने की हिम्मत लिए। मैं आज़ाद हूँ… जहाँ चाहूँ, वहाँ कदम रख सकूँ, जहाँ मन चाहे, वहाँ ठहर सकूँ। मैं आज़ाद हूँ… सोच की दीवारें तोड़ने को तैयार, दिल के फैसलों पर खुद का अधिकार। मैं आज़ाद हूँ… अपने दर्द भी खुद का, खुशियाँ भी मेरी, अपनी पहचान में पूरी, पूरी मैं ही। मैं आज़ाद हूँ… क्योंकि मैं खुद हूँ — और यही मेरी जीत है।

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कविता

: निर्मेश
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