यादो का कारवां

यादो का कारवां यादों का कारवां बारिश हल्की-हल्की हो रही थी। सड़क किनारे गीली मिट्टी की खुशबू फैली थी, और पत्तों पर जमा पानी की बूंदें हवा के साथ नीचे गिर रही थीं। रामप्रसाद अपने पुराने ट्रंक के सामने बैठा था। ट्रंक पर जंग लग चुका था, पर उसके अंदर… उसके पूरे जीवन का हिसाब था। उसके हाथ में एक पीला पड़ चुका ख़त था। ये ख़त उसकी पत्नी सावित्री का था, जो पच्चीस साल पहले चली गई थी। उसने लिखा था— "रामू, अगर मैं कभी ना रहूँ, तो मेरी यादों को संभालकर रखना। वो तुम्हें ज़िंदगी भर अकेला नहीं होने देंगी।" उस दिन के बाद से, रामप्रसाद ने हर याद को एक ख़जाने की तरह सहेज लिया। — सावित्री की पुरानी लाल साड़ी — बेटे की पहली स्कूल यूनिफ़ॉर्म — बेटी के बनाए हुए कागज़ के फूल — और पड़ोसी के हाथ से खिंची एक पारिवारिक तस्वीर अब, उम्र के आख़िरी पड़ाव पर, उसने तय किया कि वो अपने इस ट्रंक को लेकर एक सफ़र करेगा। एक ऐसा सफ़र जिसमें वो हर उस जगह जाएगा, जहां-जहां ये यादें बनी थीं। पहला ठिकाना — पुराना रेलवे स्टेशन। यहीं से उसने और सावित्री ने अपनी शादी के बाद पहली बार सफ़र किया था। आज स्टेशन सुनसान था, लेकिन रामप्रसाद की आंखों में भीड़ थी — सावित्री की हंसी, हाथ में पकड़ी स्टील की टिफ़िन डिब्बी, और सीट के नीचे रखा बैग। उसने आंखें बंद कीं, और महसूस किया कि सावित्री अब भी उसके पास बैठी है, जैसे समय ने कोई फ़ासला पैदा ही न किया हो। दूसरा ठिकाना — गांव का पीपल का पेड़। यहीं उसके बेटे ने साइकिल चलाना सीखा था। पेड़ के नीचे आज भी वही टूटी हुई पत्थर की बेंच थी। रामप्रसाद ने अपने ट्रंक से बेटे की छोटी नीली टोपी निकाली और बेंच पर रख दी। उसे याद आया, कैसे बेटा गिरकर रोया था और सावित्री ने उसे गोद में उठाकर कहा था — "रोना मत, कारवां में चलते रहो, गिरोगे तो सीखोगे।" तीसरा ठिकाना — पुराना स्कूल। वो स्कूल जहां बेटी ने पहली बार मंच पर कविता सुनाई थी। अब स्कूल में नए बच्चे थे, नए चेहरे, लेकिन दीवारों पर वही पुराना नीला रंग था। रामप्रसाद ने अपनी जेब से बेटी की छोटी चिट्ठी निकाली — जिसमें उसने लिखा था, "पापा, आप मेरे हीरो हो।" उसकी आंखों से बारिश की बूंदों जैसी नमी टपक पड़ी। आख़िरी ठिकाना — गंगा का घाट। यहीं से उसका कारवां हमेशा के लिए शांत होना था। उसने अपना ट्रंक खोला, और सारी यादें धीरे-धीरे पानी में बहा दीं — साड़ी, टोपी, तस्वीरें, ख़त… पानी उन सबको अपने साथ ले गया, जैसे नदी ने उसके पूरे कारवां को अपनी गोद में समेट लिया हो। रामप्रसाद ने महसूस किया कि उसका मन हल्का हो गया है। अब वो खाली हाथ था, लेकिन अकेला नहीं — क्योंकि वो जानता था, यादें कहीं जाती नहीं… वो बस एक अदृश्य कारवां बनकर, हमेशा उसके साथ चलती रहती हैं।

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दैनिक प्रतियोगिता

: ♥️𝄟≛⃝Sweta Agrawal🌹❤️ 🕊
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