रक्षाबंधन

रिश्ते हमेशा खून से नहीं बनते, कभी-कभी शब्दों की मिठास, अपनापन और एहसास ...... एक ऐसा बंधन रच देते हैं। जो हर दूरी, हर वक्त से परे होता है। यह कविता उसी रिश्ते को समर्पित है ... जहां लफ़्ज़ ही राखी बन जाते हैं, दुआएं ही धागा, और अपनापन ही रक्षा का वचन✍️

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दैनिक प्रतियोगिता

: Sukoon Bazzad ✍️
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