आईना और मैं

यह एक आत्मसंवाद की कविता है, जहाँ आईना न सिर्फ चेहरा दिखाता है, बल्कि मन की परतों को भी बेआवाज़ पढ़ता है। यह कविता खुद से जुड़ने, सच्चाई को स्वीकारने और भीतर झाँकने की एक भावपूर्ण यात्रा है।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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