यह कविता एक शहीद सिपाही की अंतिम संध्या को शब्दों में पिरोती है, जहाँ कर्तव्य, त्याग और अमरता एक साथ साँझ की चुप्पी में समा जाते हैं।
1. सरहद की सांझ 0 | 0 | 0 | 0 | | 27-07-2025 |
2. सरहद की सांझ 23 | 16 | 23 | 5 | | 27-07-2025 |
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