यह कविता, गंगा की ज़ुबानी है… एक नदी की कहानी नहीं, बल्कि उसकी आत्मा की चीख है, जिसे हमने पवित्र तो माना, लेकिन कभी बचाने की कोशिश नहीं की?
1. गंगा: मैं एक नदी थी, अब सवाल बन गई हू% 25 | 19 | 25 | 5 | | 25-07-2025 |
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