"आज मैंने एक वाक्य सुना — 'तीसरी भी लड़की हुई है… बहुत बुरा हुआ… लड़का होता तो अच्छा होता…' यह वाक्य किसी अख़बार की हेडलाइन नहीं था, न किसी टीवी चैनल की ब्रेकिंग न्यूज़… यह एक आम इंसान की ‘आम सोच’ थी… पर उस दिन, वो ‘आम सोच’, मेरी आत्मा को चीर गई। मैंने अपने भीतर की 'बेटी' से पूछा — क्या तू सिर्फ़ गिनती है? या भगवान की लिखी कोई अधूरी कविता?"
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