मिलन की आस–विठोबा तक की वारी

जब दिल में सिर्फ़ एक ही नाम हो, जब पाँव छालों से भरे हों, पर मन में चाँदनी हो, जब घर-बार, सुख-सुविधा सब पीछे छूट जाए… तो समझो कोई वारकरी निकल पड़ा है — अपने विठ्ठल से मिलने। इसी मिलन की आस में जन्मी है ये कविता...

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