झूठी उम्मीद

जब प्यार, भरोसा और सपनों की नींव पर टिकी उम्मीदें झूठी निकलती हैं, तो एक स्त्री कैसे खुद को समेटती है, टूटकर फिर से खड़ी होती है — यही है 'झूठी उम्मीद' की कहानी। यह सिर्फ एक लड़की की नहीं, हर उस औरत की आवाज़ है जिसने कभी किसी वादे पर विश्वास किया था।

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: विजय सांगा
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