आखिर कब तक

यह कविता "आखिर कब तक?" एक गहरे सवाल को उठाती है, जो समाज और व्यक्तिगत जीवन में निरंतर दबाव, डर और असहायता का सामना कर रहे लोगों से जुड़ी है। कविता सवाल करती है कि हम कब तक अपनी आवाज़ को दबाए रखेंगे, कब तक झूठ और डर के साए में जीते रहेंगे? यह सच्चाई और आत्मविश्वास की ओर एक प्रेरणा देती है, urging हमें अपनी असलियत को स्वीकारने और बदलाव की दिशा में कदम उठाने के लिए। यह एक जागरूकता है कि अब खामोश रहकर जीने का वक्त नहीं, हमें अपनी पहचान और हक को समझने की जरूरत है।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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