एक रोज जब किसी रस्ते से जाते हुए एक चाय की दुकान पर रुका तब मेरी नज़र एक व्यक्ति पर गई। देखने से अंदाज़ा लगाया जा सकता था कि वो बड़ी व्यथा से झुझ रहा है, ऐसा लग रहा था मानो एक पल में उसका सब छिनने जा रहा हो .....। मैं यो ही उस व्यक्ति के पास जाकर बैठा तो वो मेरी तरफ देख मुझे अपना दर्द ऐसे बताने लगा मानो मैं उसका कोई नजदीक उसका अपना हू। कहने लगे – “कोई काम नहीं मिल रहा है, पापा की उम्र 50 होने को आई है, वो अब भी मजदूरी कर रहे हैं। मां के नाजुक हाथ जिनसे वो मुझे फूली हुई रोटी घी में डाल के खिलाती थी वो हाथ रूखे हो गए उन पर भी अब झुर्रियां आने को हे और ऐसे में भी वो खानो खदानों पर जारी है और मैं..... मैं बस ये देख पाता हूं ना उनका सहारा बन पाया हू ना उन्हें काम करने से रोक पाता हूं। ऐसी विवशता में रातों की नींद दिन की धूप से भी कठिन होती हैं। कहीं भी रह नहीं पाता हूं..... मैं कैसा बेटा हूं जो अपने मां – पापा का सहारा नहीं बन पाया।”.... पर मेरे पास कहने को कुछ भी न था। मैंने कमोबेश इतना ही कहा – “सब ठीक हो जाएगा” पर उस व्यक्ति की विवशता मुझे अभी भी एक तनाव में डाले हुए हैं।
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