घूंघट — ये कविताएँ 'घूंघट' की उस परत को उघाड़ती हैं जो केवल चेहरा नहीं, आत्मा और सोच को भी ढक देती है। परंपरा, धर्म और मर्यादा के नाम पर थोपे गए इस मौन को तोड़ती स्त्री की सशक्त आवाज़ इन पंक्तियों में गूंजती है।
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