बिखरते अरमान

न जाने किन उलझनों में फंसी हुई हूं , सुलझाने की कोशिश में और उलझ रही हूं .. ये अरमानों को समेटने के चाह में , में धीरे धीरे और बिखर रही हूं..

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दैनिक प्रतियोगिता

: Jasmita Bhuyan
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