मुझको भी जीने दो

यह कविता "मुझे जीने दो" हर उस नारी की आवाज़ है जो समाज की बेड़ियों में जकड़ी होकर भी खुलकर साँस लेने की हक़दार है। यह एक भावुक पुकार है, सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर की।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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