नारी

यह कविता "नारी" के विविध रूपों, उसकी सहनशीलता, शक्ति और ममता को सरल शब्दों में समर्पित है। वह जो चुप रहकर भी बहुत कुछ कह जाती है, और हर भूमिका में जीवन को सुंदर बना देती है।

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: विजय सांगा
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