मै नदी हूं

यह कविता "मैं नदी हूं" एक नदी की आत्मकथा के रूप में रची गई है, जिसमें वह अपने जन्म से लेकर मानव समाज पर अपने प्रभाव तक की यात्रा को दर्शाती है। यह प्रकृति, सेवा, संघर्ष और चेतावनी का समन्वित चित्र प्रस्तुत करती है।

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दैनिक प्रतियोगिता

लेखक : विजय सांगा
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