यह कहानी एक वृद्ध पंडित विष्णु शर्मा की आत्मिक यात्रा को दर्शाती है, जो चमत्कार की खोज में बाहरी आडंबरों से हटकर अंतर्मन की गहराइयों में उतरते हैं। वाराणसी की रहस्यमयी गलियों से शुरू होकर एक अद्भुत आत्मबोध की ओर बढ़ती यह कथा बताती है कि सच्चा चमत्कार कहीं बाहर नहीं, बल्कि हमारे भीतर छिपा होता है—बस ज़रूरत होती है उसे पहचानने की दृष्टि की।
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