मौत अब ज़िंदगी से बेहतर लगती, हर सुबह एक सज़ा सी लगती। उम्मीदें राख हो चुकी हैं अंदर, पाप की दुनिया है—अब जीवन का मंजर।
1. कविता – पाप की दुनिया 24 | 22 | 23 | 5 | | 04-05-2025 |
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