मुझे जीने दो

यह कविता "मुझे जीने दो" एक भावनात्मक आह्वान है, जो उन मासूम आवाज़ों की ओर हमारा ध्यान खींचती है जो अक्सर दुनिया के शोर में दबा दी जाती हैं। यह रचना एक बच्चे की कल्पना से प्रस्तुत की गई है, जो जीवन की आस, सपनों की उड़ान और जीने के अधिकार की पुकार करता है। कविता नारी भ्रूण हत्या, बाल शोषण और सामाजिक असमानताओं के विरोध में एक सशक्त संदेश देती है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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