आइना

“आईना” एक आत्ममंथन की कविता है, जो एक ऐसे साथी की तरह बात करती है जो हर रोज़ हमें हमारी सच्चाई दिखाता है—बिना जज किए, बिना बोले। इस कविता में आईना सिर्फ एक वस्तु नहीं, बल्कि एक संवेदनशील दर्पण है, जो हमारे भाव, पीड़ा, प्रेम और पहचान को समझता है। गाने जैसी लय में लिखी गई यह रचना, आत्मा से संवाद करने जैसा अनुभव देती है।

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दैनिक प्रतियोगिता

लेखक : विजय सांगा
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