इतने सालों बाद आरोही बिना किसी को बताए जयपुर... अपने परिवार के पास आई, तो उसके मन में केवल अपनों से मिलने की सुकून भरी उम्मीद थी।लेकिन वह इस बात से पूरी तरह अनजान थी कि यह वापसी उसके जीवन की सबसे बड़ी उलझन बन जाएगी। क्या होगा जब उसे अपनी मां के उस चेहरे का सामना करना पड़ेगा जिसकी उसने कल्पना भी नहीं की थी। मुश्किल तब ओर बढ़ गई, जब 'कुंवर शिवांश सिंह राजपूत'... एक ऐसा नाम जो मर्यादा, सम्मान और आदर्शों का प्रतीक माना जाता है... ने पहली ही मुलाकात में सबके सामने आरोही को अपनी मंगेतर बता कर... उसे अपने साथ पूजा में बैठने पर विवश कर दिया। आरोही के लिए समय जैसे थम सा गया था। वह समझ ही नहीं पा रही थी कि यह सब हो क्या रहा है। जिस व्यक्ति से वह पहली बार मिल रही है, उसके साथ उसकी सगाई कैसे हो सकती है? और सबसे बड़ा प्रश्न... आख़िर ऐसा क्या कारण है कि अपने सिद्धांतों के लिए जाने जाने वाले कुंवर सा झूठ का सहारा ले रहे हैं? क्या यह केवल एक गलतफहमी है, या इसके पीछे छुपा है कोई गहरा राज़? क्या आरोही इस जाल से खुद को निकाल पाएगी, या फिर हालात उसे ऐसी राह पर ले जाएंगे जहां से लौटना आसान नहीं होगा? Author Sukoon Bazzad ✍️
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