धरती का दिल

धरती का दिल यूँ ही नहीं बड़ा, कितनों के पाप सहे हैं उसने खड़ा। कभी खून से सनी माटी को ओढ़ा, कभी अनाज बनकर सबको जोड़ा। कुछ अच्छे हैं, तो कुछ क्रूर गुनहगार, पर धरती ने सबको दिया है प्यार। न फ़र्क किया धर्म, जात या रंग से, हर जीवन को सींचा अपने अंग से। पर हम? हमने क्या दिया उसे बदले में? जहाँ पूजा करनी थी, वहां जुल्म किए हमने, जहाँ अन्न उगता था, वहीं लाशें गाड़ दीं हमने, जुर्म के बीज बोकर, उम्मीद की फसल काट दी। नदियाँ रोईं, पहाड़ भी थर्राए, जब धरती ने अपने दिल पर ज़ख्म खाए। हर चीख वो अंदर समा गई, माँ बनकर भी वो कुछ कह न पाई। पर अब सहन की सीमा टूट चली है, कुदरत की चेतावनी स्पष्ट खुली है। भूकंप, तूफ़ान, सूखा या जलप्रलय, सब धरती का दर्द है, उसका जवाब है ये। फिर भी... अब भी समय है, थाम लो उसे, धरती को माँ समझ, प्रणाम दो उसे। उसकी मिट्टी को माथे लगाओ, उसके अन्न को देव समझ अपनाओ। जब हम धरती को फिर से पूजेंगे, उसके आँगन को साफ़ और पावन करेंगे, तो शायद धरती भी फिर से मुस्कराएगी, हरियाली की चूनर ओढ़, फिर से गले लगाएगी। ✍🏻🥀 - कीर्ति

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लेखक : Kirti
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