परछाई

यह कविता "परछाई" के माध्यम से हमारे जीवन की उस चुपचाप चलने वाली सच्चाई को दर्शाती है, जो हर पल हमारे साथ रहती है। परछाई एक प्रतीक है आत्म-चिंतन, अकेलेपन और साथ की, जो हमेशा हमारे पीछे रहती है, मगर कभी कुछ कहती नहीं। सरल भाषा में यह कविता एक भावनात्मक और गूढ़ अनुभव को सुंदरता से प्रस्तुत करती है।

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: विजय सांगा
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