सूरज धीरे-धीरे खेतों के पीछे डूब रहा था। हवा में धूल तैर रही थी और दूर कहीं ढोलक की धीमी थाप सुनाई दे रही थी। गाँव बसेड़ीपुर की मिट्टी में आज भी हल्की सी नमी थी—मानो कुछ कहना चाहती हो। लेकिन इस बार नमी बारिश की नहीं थी, बल्कि उस दर्द की थी जिसे गाँव के लोग वर्षों से सहते आ रहे थे।
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