यह कहानी एक मध्यमवर्गीय परिवार की है, जिसे अपने पुश्तैनी घर के अधिग्रहण की खबर मिलती है। परिवार में इसे बचाने को लेकर मतभेद होते हैं, लेकिन दादी माँ समझाती हैं कि असली घर ईंटों से नहीं, बल्कि रिश्तों से बनता है। अंततः वे मुआवज़े से नया घर बनाकर फिर से एक साथ बस जाते हैं। यह कहानी परिवार की एकता और रिश्तों की अहमियत को दर्शाती है।
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