कोमल मन

यह कविता "कोमल मन" एक संवेदनशील हृदय की नाजुकता को दर्शाती है। इसमें बताया गया है कि मन कांच की तरह कोमल होता है, जो प्यार से खिल उठता है और नफरत से टूट जाता है। बचपन में यह मासूम होता है, लेकिन समय के साथ इसे ठोकरें और धोखे मिलते हैं, जिससे यह बदलने लगता है। फिर भी, यदि इसे प्रेम और स्नेह दिया जाए, तो यह हमेशा उज्ज्वल और आनंदित बना रहता है।

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: विजय सांगा
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