यह कविता होली के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डालती है। पहले होली प्रेम, आनंद और समानता का प्रतीक थी, जहाँ राधा-कृष्ण की तरह लोग रंगों से खेलते थे। लेकिन आज यह त्योहार कुछ लोगों के लिए जबरदस्ती और महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार का साधन बन गया है। कविता अच्छाई के उन रंगों को वापस लाने की अपील करती है, जहाँ होली फिर से प्रेम और खुशी का पर्व बन सके।
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