नींद नहीं आती

यह कविता एक व्यक्ति की बेचैनी को दर्शाती है, जो रात के सन्नाटे में नींद न आने की समस्या से जूझ रहा है। चाँद, हवा, और यादें उसकी बेचैनी को और गहरा देती हैं। दिनभर की बातें और बीते लम्हे दिमाग में घूमते रहते हैं, जिससे वह सोने की कोशिश के बावजूद जागता रहता है। अंततः, थकान उसे धीरे-धीरे नींद की गोद में सुला देती है। यह कविता उन सभी की भावनाओं को व्यक्त करती है, जिन्हें कभी न कभी ऐसी रातों का सामना करना पड़ा है।

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: विजय सांगा
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