गुल्लक बचपन वाला बचपन में होता था हमारा खजाना, एक गुल्लक अलग अलग शक्ल वाला। कभी गुल्लक बैगन बन आता, कभी पपीता बन इठलाता। कभी बन आता पपी हाउस, कभी बन आता मिक्की माउस। जब मैने थोड़ा होश संभाला, पापा ने प्यार इक गुल्लक दे डाला। उसे थमा कर बड़े प्यार से, समझाया जीवन की सीख, थोड़ा थोड़ा बचत करो तुम, नहीं मांगनी पड़ेगी किसी से भीख। जब भी वो ड्यूटी से आते, कुछ सिक्के थे हमें थमाते। बड़े उत्साह से हम भी उनको, उनके दिए गुल्लक में डालते। नहीं करते कोई फिजूलखर्ची, सारे खर्चों पर अपने करते कंजूसी। जब गुल्लक पूरा भर जाता, फूला नहीं था मैं समाता। उसे फोड़ कर रुपए जोड़ कर, पापा को था जब मैं थमाता।
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