यह एक हृदयस्पर्शी कहानी है, जो समाज में गहराई से जड़ें जमा चुके जातिवाद के दंश को उजागर करती है। यह कहानी माधो नामक एक ब्राह्मण की है, जो जात-पात की बेड़ियों को तोड़ने का प्रयास करता है, लेकिन समाज उसे ठुकरा देता है। अपने गांव से निष्कासित होने के बाद भी वह हार नहीं मानता और शिक्षा के माध्यम से बदलाव लाने का प्रयास करता है। वर्षों बाद जब वह अपने गांव लौटता है, तो उसे एहसास होता है कि समय बदलने के बावजूद जातिवाद का ज़हर अभी भी समाज में जीवित है। यह कहानी न केवल अतीत के संघर्षों को दर्शाती है, बल्कि एक गहरे सामाजिक प्रश्न को भी उठाती है, क्या सच में यह ज़हर कभी समाप्त होगा?
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