"इंसान के दो चेहरे" कविता जीवन की कड़वी सच्चाई को दर्शाती है। इंसान एक पल में मसीहा बनता है और अगले ही पल स्वार्थ में अंधा होकर अपने रिश्तों को ठुकरा देता है। उसकी मुस्कान में मिठास भी होती है और छल भी छिपा रहता है। कभी वह अपनों के लिए देवता बनता है, तो कभी अपने ही लोगों को गिराने में संकोच नहीं करता। इस दुनिया में इंसान का असली चेहरा पहचानना मुश्किल है, क्योंकि हर चेहरे के पीछे एक और चेहरा छिपा होता है। यही इंसान की सबसे बड़ी विडंबना है – जहाँ प्यार और स्वार्थ का खेल साथ-साथ चलता है।
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