शहर की तंग गलियों में एक बूढ़ा आदमी रोज़ सुबह अपने कंधे पर रंग-बिरंगे गुब्बारे टाँगकर निकलता था। उसकी झुर्रियों भरी आँखों में जीवन की थकान थी, लेकिन होंठों पर एक हल्की मुस्कान हमेशा बनी रहती थी। बच्चे उसे "गुब्बारे वाला चाचा" कहकर बुलाते थे। उसका असली नाम क्या था, शायद किसी को नहीं पता।
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