बचपन वाला स्कूल

यह कविता बचपन के उन सुनहरे दिनों को याद दिलाती है जब स्कूल सिर्फ़ पढ़ाई का नहीं, बल्कि मस्ती, दोस्ती और शरारतों का अड्डा हुआ करता था। सुबह की भागदौड़, टिफिन शेयर करना, मास्टर जी की डांट और बारिश में कागज़ की नाव, ये सब यादें अब मीठी कसक बन गई हैं। कविता उन मासूम पलों को फिर से जीने की चाहत को बयां करती है, जब स्कूल केवल एक इमारत नहीं, बल्कि बचपन का सबसे खूबसूरत हिस्सा हुआ करता था।

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: विजय सांगा
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