ये कहानी अनिकेत की है। उसके माता-पिता उससे उच्च अंक की उम्मीद करते हैं। स्कूल का दबाव इसे और बढ़ा देता है। कोचिंग, उम्मीदों और असफलता के डर के बीच वह घुटन महसूस करने लगता है। धीरे-धीरे, वह अवसाद की ओर बढ़ने लगता है। एक रात, जब वह हार मानने का सोचता है, उसकी माँ उसकी तकलीफ समझ जाती है। जब वह अपने दिल की बात कहता है, तो उसके माता-पिता अपनी गलती महसूस करते हैं और उसे भरोसा दिलाते हैं कि ज़िंदगी सिर्फ नंबरों तक सीमित नहीं है। माता-पिता और स्कूल काउंसलर के सहयोग से, वह तनाव को संभालना सीखता है। यह कहानी बताती है कि मानसिक स्वास्थ्य अंकों से अधिक महत्वपूर्ण है।
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