ज़िंदगी – स्वैच्छिक open topic

ज़िंदगी कभी धूप, कभी छाँव होती, कभी हँसी-ठिठोली, कभी विरान होती। कभी बहारों-सी महकती है चुपके, कभी बंजर ज़मीं-सी वीरान होती।।

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दैनिक प्रतियोगिता

: Erica
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