सुन जरा

यह एक भावनात्मक कविता है जो हमें जीवन के अनकहे पहलुओं को सुनने और महसूस करने की प्रेरणा देती है। यह कविता उन खामोश आवाज़ों, अधूरे सपनों, और छुपे हुए जज़्बातों को उजागर करती है जो अक्सर हमारी नज़रें और दिल अनदेखा कर देते हैं। हवाओं की सिसकियों से लेकर तन्हा चाँद की पुकार तक, हर पंक्ति पाठकों को गहराई से सोचने पर मजबूर करती है। यह कविता हमें सिखाती है कि सच्ची समझ कभी-कभी शब्दों में नहीं, बल्कि खामोशियों में छुपी होती है—बस ज़रूरत है दिल से सुनने की।

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दैनिक प्रतियोगिता

: विजय सांगा
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