ये कहानी 1980 के दशक की है। उन दिनों झारखंड के जंगलों में नक्सलियों की बहुत ज्यादा गतिविधियां सुनने में आ रही थी। पुलिस की टीमें आए दिन जंगलों मे जाकर गस्त लगाती थी, लेकिन उन्हें उनके बारे में कुछ भी पता नहीं चलता था। ऐसा लगता था मानो जंगल मे वो कहीं गायब हो जाते थे। बहुत ढूंढने पर भी उनका एक भी सुराग पुलिस के हांथ नहीं लगता था। उन दिनों वहां के जंगलों में कुछ अजीबो गरीब वाक्ये भी हो रहे थे। जिसके बारे मे जानने के बाद इंसान की रूह तक कांप जाया करती थी।
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