सुकून की तलाश

त्याग दो बेशक मुझे तुम, पर सुकून कहीं तुम ना पाओगे। रूह में बसी हूं मैं तुम्हारी मुझ बिन जी न पाओगे। तेरी हर सांस में हर सोच में, तेरे होठों से निकले हर शब्द में, तेरी समाहित मैं ही हूं।

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कविता

: निर्मेश
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